हत हताहत आहत जन के मन से निकली ध्वनियाँ|पहले शोर, फिर चीख , फिर बिगुल होती हैं || निष्प्राण से लगते समाज के तन सेआती अंगड़ाई|पहले मजाक , फिर कोलाहल , फिर संघर्ष बनती हैं || ये करोड़ो की कम अकल सी लगने वाली भीड़की तरंग |पहले लहर , फिर ज्वार , फिर चक्रवात स्वयं बनती हैं || From the minds of the unhurd, the wounded, the hurtrise the sounds— first a noise, then a scream, then the bugle they become. From the body of society that seems lifelesscomes a stretch of awakening— first a jest, then an uproar, then the struggle they become. This wave of the crores who seem of little sensefirst a ripple, then a tide, then a cyclone it becomes itself.
ये बड़ा लोग
ये बड़ा लोग
ये बड़ा लोग ,
नाजों से पले , बनाए गए भले ।
बचा के रखे गए आंधियों से ,
तूफानों , भूख , बर्बादियों से ।।
ये बड़ा लोग ,
राज करने के लिए बने लोग ,
हो सकता है करें जतन समझने को
पढ़ने को , देखने को , एनालाइज करने को
हम छोटे लोगों की जिंदगियां
जैसे एक जीव विज्ञानी करता है शोध
मेढकों पर , तिलचट्टों पर , केंचुओं पर ।
जानने को उनकी जिंदगियां।
ये बड़ा लोग।
टूटना ……..

कविता या कुछ “तुक मिलती पंक्तिया ” जो भी कह लीजिए , उस भाव चित्र को दर्शाती है जो जीवन साथी से विलग होने की आशंका होने पर एक सात्विक प्रेमी को होता है ।
जो इस अंधे युग मे भी प्रेम की आंखे पाने का ईश्वरीय वरदान रखते हैं , उनसे जब उनके अस्तित्व का एक हिस्सा छूटता से लगता है तो टूटन का एहसास होता है , आत्मा के चटकने की आवाज आती है , और अंतःकरण में कुछ बिखर सा जाता है।
टूटने की परिभाषाये कितनी ,
सृष्टि में सृजन की आशाएं जितनी ।
टूटता शरीर , हड्डी , पुल , मकान
टूटती शाखा , सड़क , औ दुकान ।
इन सबमे छुपा है सृजन का अंश
टूटने पर होता जो विध्वंश ।।
पर ये टूटना कुछ भी नही मनुज के लिए ,
ये सब छूटना नही बड़ा मनुज के लिए। ।
पर जब टूटता है आत्माओं का बंधन ,
सूखी आँख होता हृदय में कृन्दन ।।
चेतना की वेदना के सुर सृष्टि में गुन ,
सुनता मनुज निज संहार की धुन ।।
जब टूटने लगता है प्रेम का बंधन ,
जो था सृष्टि , सृजन , विश्व का कारण ।
मनुज लगता हारने सा खुद से ये रण ,
विस्फोटित होता प्रलय से कण कण ।।
हे विधाता , तोड़ देना भले ये भंगुर मकान ।
मत तोड़ना कभी आत्मा के बंध का विधान।।
पिता

ये कविता या यूं कहूँ , भावनाओ का समुच्चय जो तुकबंदी सा बन पड़ा , father’s day पर गढ़ा गया । पिता के सम्मान का दिन पाश्चात्य सभ्यता भले ही निर्धारित करे , पूर्व का दर्शन तो पिता को अस्तित्व का अनवरत हिस्सा मान कर चलता है।
हे पिता , विश्व हो तुम ।
खुद के रक्त से सींचते सन्तान को ,
देते शक्ति पुत्र के प्राण को ।।
पंचतत्वो के शरीर का आधार हो तुम ,
हे पिता , विश्व हो तुम ।
पुत्र पुत्री के लिए जीवन कर समर्पित ,
हमारे भविष्य हेतु अपना वर्तमान अर्पित ।
बिना श्रेय लिए मेरी सफलता में गर्वित ,
तृण मात्र कष्ट भी हो मुझे , तुम द्रवित ।
इस मरुस्थल में सतत जल के दृश्य हो तुम ,
हे पिता विश्व हो तुम ।
Translation ::
O father , you are my universe !
Though sons grow from your blood ,
Thy power give them breath |
You are the basis of this elemental body ,
O father , you are my universe !
You dedicated your life for your children ,
For there future you sacrificed your present .
You are proud of our sucess with out taking credit ,
You feel ten , even if my pain is one .
Amidst this desert of life , you are the eternal oasis .
O father , you are my universe !



