टूटना ……..

कविता या कुछ “तुक मिलती पंक्तिया ” जो भी कह लीजिए , उस भाव चित्र को दर्शाती है जो जीवन साथी से विलग होने की आशंका होने पर एक सात्विक प्रेमी को होता है ।

जो इस अंधे युग मे भी प्रेम की आंखे पाने का ईश्वरीय वरदान रखते हैं , उनसे जब उनके अस्तित्व का एक हिस्सा छूटता से लगता है तो टूटन का एहसास होता है , आत्मा के चटकने की आवाज आती है , और अंतःकरण में कुछ बिखर सा जाता है।

टूटने की परिभाषाये कितनी ,
सृष्टि में सृजन की आशाएं जितनी ।

टूटता शरीर , हड्डी , पुल , मकान
टूटती शाखा , सड़क , औ दुकान ।

इन सबमे छुपा है सृजन का अंश
टूटने पर होता जो विध्वंश ।।

पर ये टूटना कुछ भी नही मनुज के लिए ,
ये सब छूटना नही बड़ा मनुज के लिए। ।

पर जब टूटता है आत्माओं का बंधन ,
सूखी आँख होता हृदय में कृन्दन ।।
चेतना की वेदना के सुर सृष्टि में गुन ,
सुनता मनुज निज संहार की धुन ।।

जब टूटने लगता है प्रेम का बंधन ,
जो था सृष्टि , सृजन , विश्व का कारण ।
मनुज लगता हारने सा खुद से ये रण ,
विस्फोटित होता प्रलय से कण कण ।।

हे विधाता , तोड़ देना भले ये भंगुर मकान ।
मत तोड़ना कभी आत्मा के बंध का विधान।।

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